छत्तीसगढ़ के जनजातियाँ 

October 16, 2018

छत्तीसगढ़ के जनजातियाँ

गोंड जनजाति –

गोंड छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी जनजाति है। यंहा के कुल जनजाति के 55% जनजाति गोंड है। गोंड लोग खुद को कोयतोर कहते है। जिसका अर्थ पर्वतवासी होता है। गोंड शब्द की उत्त्पत्ति तेलगु शब्द कोंड से हुई है जिसका अर्थ पर्वत होता है।

गोंड की 41 उपजातिया है जिसमे परधान, भरिया, मुड़िया, भारिया आदि प्रमुख है। ये मुख्यता जगदलपुर और दंतेवाड़ा में निवास करते है। इनकी बोली गोंडी है।

गोंड दिखने में छोटे कद वाले होते है। इनका रंग काला होता है। इनका मुख्य आभूषण गोदना होता है। ये मिटटी के बने घरो में रहते है। इनका लोकप्रिय भोजन पेज है।

सामान्यता गोंड जनजाति में एक विवाह प्रचलित है परन्तु एक से अधिक विवाह भी मान्य है। दूध लौटवा, विधवा विवाह, लमसेना इनकी प्रचलित विवाह पध्दति है।

गोंड जनजाति के लोग अपने जीविका चलने के लिए पशुपालन, स्थायी खेती, मुर्गीपालन और मजदूरी करते है। गोंड जानजाती के प्रमुख देवता दूल्हादेव है। बस्तर क्षेत्र में दंतेश्वरी देवी प्रसिद्ध है। मड़ई, नवाखानी, ज्वारा इनके प्रमुख त्यौहार है। इनके प्रमुख नृत्य कर्मा, सुवा, गेड़ी सैला आदि है।

उरांव जनजाति –

जनजातियों में उरांव सबसे साक्षर जनजाति है। इनकी बोली कुरुख है। इन्हे धनका या धनगड़ भी कहते है।ये जनजाति मुख्यता छत्तीसगढ़ के उत्तर दिशा में निवास करते है। उरांव जनजाति के लोग मिटटी के बने घर पर रहते है। इनका प्रमुख वस्त्र धोती, बंडी आदि है। स्त्रियों को अपने शरीर में गोदना अंकित करवाना अधिक प्रिय है। इनका प्रिय पेय शराब है।

उरांव जनजाति के युवक-युवतियों के लिए युवागृह होता जिसे धुमकुरिया” कहते है। धुमकुरिया के प्रमुख को धांगर कहते है। उरांव जनजाति के लोग अपनी जीविका चालने के लिए खेती, मुर्गीपालन व् मजदूरी करते है।

उरांव जनजाति सरनादेवी और धर्मेश नामक ईश्वर पर विश्वास रखते है तथा इन्हे प्रसन्न करने हेतु सफ़ेद मुर्गी की बलि चढ़ाते है। इनके पूजा स्थल को बगिया कहते है।

सरहुल इनका प्रमुख नृत्य है। चैत्र महीने में साल वृक्ष में फूल आने पर सरनदेवी की पूजा की जाती है और सरहुल नृत्य किया जाता है।

अबुझमाड़िया-

माड़िया जनजाति का एक शाखा अबूझमाड़ है। ये दण्डकारियो के पहाड़ में निवास करते है। अबूझमाड़ का मतलब अज्ञात होता है। अपने आप को ये लोग मेटाभूम कहते है।
इनका घर मिटटी, लकड़ी बांस से बने होते है। ये शाकाहारी और मांसाहारी दोनों होते है।

अबूझमाड़िया स्थान्तरित कृषि करते है जिसे पेद्दा कहते है। लगभग प्रत्येक घरो के पास बाड़ा बनाया जाता है जिसमे सब्जी आदि की खेती किया जाता है।

अबुझमाड़िया जनजाति के विकास के लिए शासन ने अबूझमाड़ जनजाति को विशेष पिछड़ा जनजाति घोषित किया है।

माड़िया –

माड़िया जनजाति गोंड की उपजाति है। वेरियन एल्विन ने अपनी कृति में माड़िया जनजाति का वर्णन गौर नाम से किया है।

माड़िया जनजाति के लोग प्रत्येक गांव में घोटलु युवा गृह बनाते है जंहा युवक-युवती शिक्षा ग्रहण करते है। इस जनजाति में बहु विवाह, सेवा विवाह और विधवा विवाह प्रचलित है। इनका प्रिय पेय सल्फी है।

माड़िया लोग स्थान्तरित खेती करते है जिसे झूम खेती कहा जाता है। देवता में लिंगपेन, दूल्हादेव और देवी में भूमि माता इनके आराधय देवी-देवता है।

गौर नृत्य माड़िया जनजाति का लोकप्रिय नृत्य है जिसे वेरियन एल्विन ने विश्व की सबसे सुन्दर नृत्य कहा है। गौर नृत्य में बायसन नामक जंगली जीव के सींग को अपने सर पर लगा कर नृत्य करते है।

मुड़िया जनजाति 

मुरिया जनजाति गोंड कोयतोर की उपजाति है। मुड़िया का अर्थ आदिम होता है। यह जनजाति के लोग मुख्यता छत्तीसगढ़ के दक्षिण क्षेत्र में निवास करते है।

ये मिटटी के घर बनाकर रहते है तथा जंगल में निवास करते है। मुड़िया में भगेली विवाह, दूध लौटवा आदि विवाह का प्रचलन है। इनका प्रिय पेय सल्फी है।

मुड़िया जनजाति के लोग प्रत्येक गांव में युवा गृह बनाते है जिसे घोटलु कहा जाता है। घोटलु में युवक-युवती शिक्षा ग्रहण करते है।

मुड़िया लोग स्थायी कृषि करते है। इनके प्रमुख देवता लिंगोपेन, ठाकुरदेव और महादेव है। इनका प्रमुख नृत्य ककसार, मांदरी, हुल्कापाटा है। इनका प्रमुख लोकनाट्य माओपाटा है।

विशेष अवसर पर रिलो गीत गाया जाता है। वेरियन एल्विन अपने कृत्य में मुड़िया एंड देयर घोटलु में मुड़िया जनजाति का वर्णन किया है।

बैगा जनजाति-

बैगा का शाब्दिक अर्थ पुरोहित होते है। ये जनजाति गोंडो के पुजारी के रूप में काम करते है। इन्हे शासन द्वारा विशेष पिछड़ा जनजाति घोषित किया है। बैगा लोगो को जड़ी बूटी का अच्छा ज्ञान होता है। बैगा जानजाती प्रायः छत्तीसगढ़ के पश्चिम दिशा मैकल श्रेणी में निवास करते है।

बैगा जनजाति प्रायः जंगल में निवास करते है। बांस और मिटटी के घर बनाकर अपना जीवन यापन करते है। ये लोग स्थान्तरित खेती करते है। जिसे बेवार कहते है। इनका प्रमुख देवता बूढ़ादेव है। करमा इनका प्रमुख नृत्य है।

बैगा जनजाति में शरीर में गोदना अंकित करवाने का बहुत प्रचलन है। महिलाये की साज-सज्जा का मुख्य साधन गोदना है। ताड़ी, सल्फी इनका प्रमुख पेय है। वेरियन केल्विन की कृत्य बैगास से बैगाओं के बारे में जानकारी मिलती है।

हल्बा जनजाति –

हल्बा जनजाति के लोग छत्तीसगढ़ में मुख्यता दक्षिण भाग में निवास करते है। ये हल्बी बोली बोलते है। हल वाहक होने के कारण इन्हे हल्बा कहा गया है। इस जनजाति में लमसेना विवाह प्रचलित है। अगर उचित वर न मिले तो महुआ वृक्ष से विवाह किया जाता है।

हल्बा जनजाति के लोग आर्थिक रूप से विकसित जनजाति है। इस जनजाति के लोग मुख्यता खेती करते है। दशहरा, दीपावली, होली, नवाखानी इनके प्रमुख त्यौहार है।

कोरवा जनजाति –

कोरवा जनजाति, कोल जनजाति की एक शाखा है। यह पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों में निवास करते है। पहाड़ो में रहने वालो को पहाड़ी कोरवा और मैदान में रहने वाले को दहाडी कोरवा कहते है।

कोरवा की तीन उपजाति है -कोड़कू, बिंझिया और मंदिया। इनका प्रिय पेय हांडिया है। जिसे चावल से बनाया जाता है। कोरवा जलजाति में ढुकु विवाह और मंगी विवाह प्रचलित है।

कोरवा स्थान्तरित कृषि करते है जिसे बेवारी कहते है। इनका मुख्य देवता भूड़ादेव, खुड़िया रानी, ठाकुर देव, आदि है। इनका प्रमुख नृत्य दमनज (भयोत्पादक) है। नवाखानी, देवारी, होली इनके प्रमुख त्यौहार है।

कमार जनजाति –

कमार गोंडो की उपजाति है। ये मुख्यता छत्तीसगढ़ के पूर्व दिशा में निवास करते है। जी.एस. घुरिये ने अपनी कृत्य कमार में कमार जनजाति का वर्णन किया है। कमार जनजाति के लोग पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रो में निवास करते है। पहाड़ी क्षेत्रो में निवास करने वालो को पहाड़पतिया और मैदानी क्षेर्तो में निवास करने वालो को बँधरिज्जिया कहते है।

इनका घर प्रायः बांस, मिटटी, लकड़ी के बने होते है। अगर घर में ही किसी की मृत्यु हो जाये तो अपनी परंपरा के अनुसार ये लोग नया घर बनाते है और पुराने घर को छोड़ देते है। पेज इनका प्रिय पेय है। अपहरण विवाह, सेवा विवाह कमार जनजाति के प्रमुख विवाह पध्दति है।

कमार जनजाति के लोग अपनी जीविका चलने हेतु झूम खेती, पशुपालन और बांस शिल्प करते है। कमार की कृषि पध्दति को दाहिया कहते है। दूल्हादेव, महादेव, ठाकुरदेव इनके प्रमुख देवता है। हरेली, नवाखानी इनके प्रमुख त्यौहार है। हरेली में गेड़ी नृत्य करते है।

कंवर जनजाति –

कंवर जनजाति गोंडो की उपजाति है। अपनी जीविका के लिए ये मुख्यता सैन्य कार्य करते है। सैन्य कार्य के अतिरिक्त खेती, पशुपालन आदि करते है।

गहिरा गुरु कंवर समाज के थे। जो की सतनाम धर्म संत समाज के संस्थापक है। कंवर जनजाति का प्रमुख नृत्य बार है। इस जनजाति के महिला अपने शरीर पर कृष्णा भगवान् की चित्र का गोदना अंकित करवाते है ।

बिरहोर जनजाति –

बिरहोर का अर्थ वन्य जाती होता है। यह जनजाति विशेष पिछड़ी हुई जनजाति है। इनकी भाषा मुंडा हुआ करती थी। किन्तु अब यह लोग मुंडा भाषा को भूल गए है। इनका युवागृह गीतुओना है। इनका प्रमुख व्यवसाय कृषि है। यह प्रायः जशपुर और रायगढ़ जिले में निवास करते है।

बिंझवार जनजाति –

यह जनजाति विंध्य पर्वत में निवासी थे जिसके वजह से इस जनजाति का नाम बिंझवार पड़ा। बिंझवार छत्तीसगढ़ में व्याप्त रूप से निवास करते है। छत्तीसगढ़ी भाषा ही इनका मूल भाषा है।इस राज्य के प्रथम शहीद वीरनारायण सिंह जी इसी समुदाय के थे। इनकी जाती का प्रतिक चिन्ह तीर है। उचित वर न मिलने पर तीर से विवाह किया जाता है। जिसे तीर विवाह कहते है।

कोल जनजाति –

यह मुंडा समूह की प्राचीन जनजाति है। इनका उल्लेख ऋग्वेद, महाभारत, रामायण आदि प्राचीन ग्रंथो में मिलता है। कोल एक कला संस्कृति जाति है। इनका प्रसिद्ध नृत्य कोलदहका है। छत्तीसगढ़ के उत्तर दिशा में यह समुदाय के लोगो का रहन-बसन है।

कोरकू जनजाति –

कोरु का अर्थ पुरुष होता है। कोरु में को प्रत्यय लगने से कोरकू बना है। कोरकू का अर्थ मनुष्यो का समूह है। ये मुख्यता सतपुड़ा पर्वत में निवास करते है। इनका प्रमुख नृत्य थापटी है। इनके आलावा ढाढल नृत्य भी प्रसिद्ध है। यह अपना जीवनयापन करने हेतु कृषि कार्य करते है।

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