छत्तीसगढ़ का आधुनिक इतिहास P1

October 16, 2018

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आधुनिक काल

ब्रिटिश शासन का आरम्भ छत्तीसगढ़ में –

भोसले शासन के अंतिम जिलेदार गोपाल राव के द्वारा 1 फ़रवरी 1855 को प्रथम डिप्टी कमिश्नर चार्ल्स सी इलियट को छत्तीसगढ़ की सत्ता सौपी गयी। इस तरह छत्तीसगढ़ पूर्ण रूप से ब्रिटिश शासन के अंतर्गत आ गया।

ब्रिटिश शासन के आने के बाद शासन करने के तरीको में भी बदलाव आया। कई सारी व्यवस्थाएं लागू की गयी। जिसमे तहसीलदारी व्यवस्था, जिलेदारी व्यवस्था, राज्य व्यवस्था, न्याय व्यवस्था, पुलिस व्यवस्था, डाक व्यवस्था, यातायात व्यवस्था, उद्योग, शिक्षा आदि की व्यवस्था की गयी थी।

ब्रिटिश शासन [ प्रमुख विद्रोह और क्रांति ] – ब्रिटिश शासन के विरुद्ध छत्तीसगढ़ में भी विद्रोह हुआ था। आईये उसे संक्षिप्त रूप से जानते है

जनजातीय विद्रोह 

हल्बा विद्रोह –

हल्बा विद्रोह अजमेर सिंह के द्वारा सन 1774 से 1779 के बिच में हुआ था। यह विद्रोह उत्तराधिकारी के लिए हुआ था। अजमेर सिंह का विपक्षी दरियाव देव था। सन 1777 में अजमेर सिंह के मृत्यु के बाद विद्रोह समाप्त होने लगा। इसमें भारी संख्या में हल्बा सेनाओं की हत्या की गयी।

परलकोट विद्रोह –

परलकोट विद्रोह 1825 में हुआ था। उस समय यंहा के शासक महिपाल देव था। परलकोट के जमींदार गेंदसिंह के नेतृत्व में यह जनजातीय विद्रोह हुआ था। अंग्रेजो और मराठो के प्रति असंतोष ही इस विद्रोह का कारण बना था। प्रतिक चिन्ह के रूप में धारवाड़ वृक्ष के टहनियों का प्रयोग करते थे।

मेरिया विद्रोह –

मेरिया विद्रोह 1842 से 1863 के बिच हुआ। उस समय यंहा के शासक भूपाल देव था। इस विद्रोह का नेतृत्व हिड़मा मांझी ने की थी। इस विद्रोह का प्रमुख कारण था अंग्रेजो के द्वारा दंतेश्वरी मंदिर में नरबलि प्रथा को समाप्त करना। उस समय मेरिया लोगो का कहना था की अंग्रेज हमारी संस्कृति में हस्तक्षेप न करे।

तारापुर विद्रोह –

यह विद्रोह 1842 से 1854 के बिच में हुआ था। उस समय यंहा के शासक भूपाल देव था। तारापुर विद्रोह का नेतृत्व दलगंजन सिंह ने किया था। उस समय अंग्रेजो द्वारा तारापुर में कर बढ़ने की वजह से यह विद्रोह हुआ था। परिणाम दलगंजन सिंह के पक्ष में गया और अंग्रेजो ने कर नहीं बढ़ाया।

लिंगागिरी विद्रोह –

यह विद्रोह 1856 से 1857 के बिच में हुआ था। उस समय यंहा के शासक भैरम देव था। लिंगागिरी विद्रोह का नेतृत्व धुर्वाराव मदिया ने की थी। उस समय अंग्रेज लिंगागिरी क्षेत्र में अपना अधिकार जमाना चाहते थे। इसी विरुद्ध में लिंगागिरी विद्रोह हुआ था। परिणाम स्वरूप धुर्वाराव को फांसी दे दी गयी।

कोई विद्रोह –

यह विद्रोह 1859 में हुआ था। भैरम देव यंहा के शासक थे। इस विद्रोह के नेता नांगुल दोर्ला था। इस विद्रोह का प्रमुख कारण उस क्षेत्र में हो रहे साल वृक्षों की कटाई पर रोक लगाना था। यह पहला विद्रोह था जो सफल रहा और अंग्रेजो की हार हुई।

मुरिया विद्रोह –

यह विद्रोह 1876 में हुआ था। इस विद्रोह को बस्तर का स्वाधीनता संग्राम कहते है। उस समय के शासक भैरम देव था। इस विद्रोह का नेतृत्व झाड़ा सिरहा जो कि एक मुरिया आदिवासी थे, ने किया था। आम वृक्ष टहनियों को इन्होने अपना प्रतिक चिन्ह बनाया था। अंग्रेजो द्वारा की गयी असहनीय नीतियों के विरुद्ध यह विद्रोह हुआ था।

भूमकाल विद्रोह-

यह विद्रोह 1910 में हुआ था। उस समय के शासक रुद्रप्रताप देव थे। गुण्डाधुर इनके प्रमुख नेता थे। अंग्रेजो के द्वारा बस्तर क्षेत्र हुकूमत के विरुद्ध यह विद्रोह हुआ था। लालमिर्च और आम कि टहनिया इस विद्रोह का प्रतिक चिन्ह था। सोनू मांझी ने गुण्डाधुर से धोखेबाजी कि जिसके फलस्वरूप गुण्डाधुर पकड़ा गया। बाद में गुण्डाधुर अंग्रजो के चंगुल से भागने में सफल हुआ।

सोनाखान विद्रोह –

सोनाखान का विद्रोह 1856 में हुआ था। यह विद्रोह सोनाखान के जमींदार वीरनारायण सिंह ने अंग्रेजो के विरुद्ध किया था। उस समय सोनाखान रायपुर जिले के बलौदाबाजार तहसील में आता था। सन 1856 में सोनाखान तहसील में अकाल पड़ा। यह अकाल इतनी भयंकर थी की वंहा के स्थानीय निवासी भूख के कारण मरने लगे थे।

वीरनारायण को जब यह बात पता चली तो उसने कसडोल नामक स्थान में उपस्थित एक व्यापारी की गोदाम की अनाज अपनी भूखी जनता में बाँट दी। वीरनारायण सिंह ने इसकी जानकारी तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर को उसी समय बता दी थी । परन्तु शासकीय बयान में डिप्टी कमिशनर ने अपना बयान तोड़ मडोकर पेश किया। इस वजह से वीरनारायण सिंह को जेल भेज दिया गया।

पैदल सेना की मदद से वीरनारायण सिंह जेल से भागने में कामयाब हुए। पर कुछ समय बाद ही लेफ्टिनेंट स्मिथ ने जमीदारो के मदद से वीरनारायण सिंह को पुनः पकड़ लिया। तत्कालीन डिप्टी कमिशनर इलियट ने वीरनारायण सिंह पर राजद्रोह का आरोप लगाकर फांसी की सजा सुना दी।

10 दिसम्बर 1857 को रायपुर के जयस्तम्भ चौक पर वीरनारायण सिंह को फांसी पर चढ़ा दिया गया। वीरनारायण सिंह छत्तीसगढ़ स्वतंत्रता आंदोलन के प्रथम शहीद के नाम से जाने जाते है। वर्तमान समय में इनके नाम पर इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम नया रायपुर में स्थित है।

हनुमान सिंह का विद्रोह –

हनुमान सिंह बैसवारा के राजपूत थे और रायपुर बटालियन में मैगनीज लश्कर के पद थे। इसे छत्तीसगढ़ का मंगल पांडेय कहा जाता है। यह अंग्रेजो के दमनकारी नीतियों से परेशान थे। इन्होने अपने 17 साथियो के साथ मिलकर मेजर सिडवेयर की हत्या कर दी।

18 जनवरी 1858 को हनुमान सिंह और उसके सभी साथी गिरफ्तार कर लिए गए। पर हनुमान सिंह वंहा से भागने में कामयाब हो गए। हनुमान सिंह के साथियो को 22 जनवरी 1858 को फांसी दे दी गयी।

सुरेंद्रसाय का विद्रोह-

सुरेंद्र साय सम्बलपुर के जमींदार थे। इन्हे छत्तीसगढ़ स्वतंत्रता आंदोलन के अंतिम शहीद कहते है। इन्होने वीरनारायण सिंह के पुत्र के साथ मिलकर उत्तराधिकारी युद्ध किया था। यह अंग्रजो को  सही नहीं लगा और हजरीबाग जेल में बंद कर दिया। 31 अक्टूबर 1857 को जेल से फरार हो गए। इनकी मृत्यु 1884 में हुआ।

राष्ट्रीय आंदोलन

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की स्थापना के बाद यहाँ की राष्ट्रवादी गतिविधियाँ लगभग पुरे तरीके से कांग्रेस से जुड़ गई। फिर आगे चलकर इसी से संगठित हुई। सन 1891 के नागपुर अधिवेशन के समय छत्तीसगढ़ का सम्बन्ध कांग्रेस से हुआ।

1905 में नागपुर में आयोजित प्रथम प्रांतीय राजनीतिक परिषद् की बैठक में कांग्रेस की गतिविधियों का सीधा प्रभाव छत्तीसगढ़ पर पड़ा। 1906 में द्वितीय प्रांतीय राजनितिक परिषद् में दादा साहेब खापड़े का स्वदेशी आंदोलन प्रस्ताव को स्वकृति मिल गयी। इसी समय रायपुर में कांग्रेस शाखा की स्थापना हुई।

छ.ग. में होमरूल आंदोलन –

1918 में रायपुर में होमरूल लीग का सम्मलेन आयोजित हुआ। पंडित रविशंकर शुक्ल यंहा के प्रमुख संगठन कर्ता करता थे। इसी समय तिलक रायपुर आये थे।

छत्तीसगढ़ में कुंजबिहारी अग्निहोत्री, गजाधर साव, गोविन्द तिवारी, राघवेंद्र, बैरिस्टर छेदीलाल सिंह इस आंदोलन के अग्रदूत थे।

छ.ग. में रोलेट एक्ट का विरोध –

रोलेट एक्ट का छत्तीसगढ़ में हड़ताल और सभाएँ द्वारा कानून का विरोध कर के किया गया।

राजनंदगांव में प्यारेलाल सिंह के नेतृत्व में विरोध हुआ और बिलासपुर में ठाकुर छेदीलाल, ई. राघवेंद्र, शिव दुलारे के नेतृत्व में काले वस्त्र धारण करके रैली निकलकर विरोध किया।

छत्तीसगढ़ और असहयोग आंदोलन-

असहयोग आंदोलन भारत का प्रथम राष्ट्रीय आंदोलन था। कंडेल नगर सत्याग्रह के रूप में छत्तीसगढ़ में यह आंदोलन शुरू हुआ। असहयोग आंदोलन के समय राघवेंद्र राव, ठाकुर प्यारे लाल सिंह आदि ने अपनी वकालत से त्यागपत्र दे दिया।

यह आंदोलन 1920 – 1922 तक चला। पंडित सुंदरलाल शर्मा, पंडित रविशंकर शुक्ल, ठाकुर प्यारेलाल सिंह आदि ने इस आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। इस आंदोलन के समय राष्ट्रीय विद्यालयों की स्थापना हुई। विदेशी कपड़ो का बहिष्कार हुआ।

पुरे छत्तीसगढ़ में जगह -जगह प्रदर्शन हुए। सिहावा नगरी सत्याग्रह और मजदुर आंदोलन ,असहयोग आंदोलन का ही प्रभाव था। अंततः चौरा-चौरी कांड के बाद इस आंदोलन की समाप्ति हुई।

छत्तीसगढ़ में मजदूर आंदोलन-

राजनांदगांव में ठाकुर प्यारेलाल सिंह स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रीय रूप से भूमिका निभा रहे थे। इन्होने मजदूरों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ आंदोलन किया जो मजदूर आंदोलन के रूप में दिखाई पड़ने लगा।

प्रथम आंदोलन 1920 में हुआ। इसका प्रमुख कारण मजदूरों से अधिक कार्य कराया जाना था। द्वितीय आंदोलन 1924 में हुआ। 1920 में बी.एन.सी मिल मजदूरों का ऐहितासिक हड़ताल प्यारलाल ठाकुर के अनुगाई में हुई, जो की 36 दिनों तक चली थी।

कंडेल नहर सत्याग्रह ( बारदोली या चम्पारण ) –

यह सत्याग्रह धमतरी के कंडेल नामक ग्राम में हुआ था। सिचाई टैक्स के विरुद्ध यह सत्याग्रह हुई थी।

अगस्त 1920 में कंडेल ग्राम को अनुबंधन के अंतर्गत लाने की दृष्टि से षड्यंत्र के तहत ग्राम में बिना मांग के अंग्रेजो के द्वारा जल प्रवाहित कर दिया गया। परन्तु गांव वाले ने अनुबंध करने से मन कर दिया।

इसके चलते सरकार ने गांव वालो पर चोरी का आरोप लगाकर 4033 रूपए का जुर्माना लगा दिया। इसी कारण गांव की जनता ने विद्रोह प्रारम्भ कर दिया गया।

इसी समय सुंदरलाल शर्मा ने गांधीजी को छत्तीसगढ़ आने का निवेदन किया। 20 दिसम्बर 1920 को गाँधी जी छत्तीसगढ़ आये। परन्तु इससे पूर्व ही अंग्रेजो ने टैक्स आरोपण को वापस ले लिया।

गाँधीजी का प्रथम छत्तीसगढ़ आगमन

सुन्दरलाल शर्मा ने कंडेल नहर सत्याग्रह के सन्दर्भ में गांधीजी को छत्तीसगढ़ आने का निवेदन किया। उस समय गाँधी जी बंगाल दौरे में थे। सुंदरलाल शर्मा उन्हें आमंत्रित करने कलकत्ता गए और गाँधीजी ने छत्तीसगढ़ आने का निमत्रण को स्वीकार कर लिया।

गाँधी जी 20 दिसम्बर 1920 को पंडित सुंदरलाल शर्मा के साथ रायपुर रेलवे स्टेशन में पहुंचे। उनके साथ खिलाफत आंदोलन का नेतृत्व कर रहे मौलाना शौकत अली भी रायपुर आये थे।

रायपुर पहुंचते ही कंडेल नहर सत्याग्रह में मिली सफलता के बारे में सुचना मिली। गाँधीजी ने रायपुर के गाँधी चौक में जनता को सम्बोधित किया और असहयोग आंदोलन के बारे में जानकारी दी।

21 दिसम्बर 1920 को गाँधीजी और मौलाना शौकत अली धमतरी पहुंचे थे। धमतरी नगर के मकई बंध चौक में उत्साही जनता ने इनका स्वागत किया। गाँधीजी के द्वारा जनता को सम्बोधित करने के लिए जानी हुसैन का बाड़ा तय किया गया था।

खिलाफत आंदोलन और छत्तीसगढ़ –

खिलाफत आंदोलन एक राष्ट्रीय आंदोलन था जिसका नेतृत्व मौलाना शौकत अली कर रहे थे। छत्तीसगढ़ में भी यह आंदोलन ने तुक पकड़ लिया था। इसे के चलते यंहा खिलाफत समिति का गठन किया गया।

इस आंदोलन का मुख्य मकसद था मुसलमानो की हितो का रक्षा करना। 17 मार्च 1920 को रायपुर में एक आम सभा हुई जिसमे मुसलमानो के धार्मिक प्रमुख खलीफाओं के सम्मान की बात कही गयी।

उस समय पंडित रविशंकर शुक्ल ने कहा था – हम लोग हिन्दू और मुस्लमान नहीं रहे बल्कि सभी अर्थो में हम हिंदुस्तानी है “

छत्तीसगढ़ में जंगल सत्याग्रह 

यंहा जंगल सत्यग्राह होने का कारण था अंग्रेजो का वन कानून बनाना। उस समय छत्तीसगढ़ की अधिकांश आबादी खासकर के आदिवासियों की जीविका का साधन वन उत्पाद पर निर्भर था परन्तु अंग्रजो के द्वारा बनाई गयी वन निति से आदिवासियों के अधिकारों का हनन होने लगा और इसके विरोध में छत्तीसगढ़ में जंगल सत्याग्रह का प्रारम्भ हुआ।

सिहावा नगरी जंगल सत्याग्रह –

यह सत्याग्रह 1922 में हुआ था। पंडित सुंदरलाल शर्मा, छोटेलाल श्रीवास्तव, नारायण राव मेघावाले आदि इस जंगल सत्याग्रह के नायक थे। सिहावा नगरी जंगल सत्याग्रह छत्तीसगढ़ का प्रथम जंगल सत्याग्रह था।

अंग्रेजो द्वारा वनो को आरक्षित घोषित करना ही इस सत्याग्रह का प्रमुख कारण था। लोगो ने आरक्षित वनो का उपयोग करके वन कानून का विरोध किया।

गट्टासिल्ली सत्याग्रह-

अंग्रेजो द्वारा बनाये गए वन कानून स्थायी लोगो के लिए मुसीबत बनती गयी। धमतरी के सिहावा खंड के ठेमली गांव के वनरक्षित क्षेत्र में मवेशियों को घास चरने के अपराध में गट्टासिल्ली के कांजी हाउस में डाल दिया गया।

इसी मवेशियों को छुड़वाने हेतु यह सत्याग्रह किया गया। यह सत्याग्रह सफल रही और मवेशियों को छोड़ दिया गया। नारायण राव मेघावाले, नाथू जगताप छोटे लाल श्रीवास्तव ने यह सत्याग्रह किया था।

रुद्री- नवागांव जंगल सत्याग्रह-

वन कानून के विरोध में 22 अगस्त 1930 को बड़ी संख्या में सत्याग्रहियों ने नवागांव स्थित रुद्री वनविभाग की सुरक्षित घास को काट कर कानून का उल्लंघन करने का निर्णय लिया।

इस कार्य को अंजाम देने वाले थे नारायण मेघावाले, जगताप आदि परन्तु जैसे ही यह सूचना अंग्रेजो को मिली उन्होंने सभी लीडर को गिरफ्तार कर लिया तथा वंहा धारा 144 लगा दिया। रुद्री पहुंची भीड़ पर अंग्रजो द्वारा गोली चलाई गयी जिसमे सिंधु कुमार नामक व्यक्ति मारा गया।

तमोरा जंगल सत्याग्रह –

इसके लीडर थे यतियतन लाल। सत्याग्रहियों ने तमोरा नामक गांव से जंगल की ओर प्रस्थान की और सत्याग्रह की शुरुवात की। वंहा की बालिका दयावती ने रेंजर को थप्पड़ मार दिया था। जिसके कारण सत्याग्रह उग्र रूप धारण कर लिया।

सविनय अवज्ञा आंदोलन के समाप्ति के साथ ही यह सत्याग्रह भी समाप्ति हो गया।

सविनय अवज्ञा आंदोलन छत्तीसगढ़ –

सविनय अवज्ञा आंदोलन गाँधीजी का दूसरा बड़ा आंदोलन था। छत्तीसगढ़ में भी इसका बहुत बड़ा असर पड़ा। रायपुर में पंडित रविशंकर शुक्ल ने सोडा और हाइड्रोक्लोरिक एसिड मिलकर नमक बनाया और नमक कानून को तोडा।

यतियतन ने तमोरा में, नाथू जगताप और नारायण मेघवाल ने धमतरी में, गट्टासिल्ली तथा रुद्री में जंगल सत्याग्रह किया। यंहा रायपुर में बलिराम ने वानर सेना गठित किया। वासुदेव देवरस ने बिलासपुर में आंदोलन किया।

इस दौरान जुलुश निकले गए, हड़ताले हुई, विदेशी कपड़ो को जलाया गया। गाँधी- इरविन समझौता के साथ ही यह आंदोलन समाप्त हो गया।

गाँधी जी का द्वितीय छत्तीसगढ़ आगमन

22 नवम्बर 1933 को गाँधी जी दूसरी बार छत्तीसगढ़ आये थे। 23 नवम्बर को रायपुर के तत्कालीन विक्टोरिया गार्डन में स्वदेसी प्रदर्शन का उद्घाटन किया। गाँधीजी ने हरिजनों के उद्धार के लिए छत्तीसगढ़ में कई जगह भ्रमण किये।

छत्तीसगढ़ में हरिजनों के उद्धार का कार्य 1917 से ही पंडित सुंदरलाल शर्मा ने प्रारम्भ कर दिया था। जिसे जानकर गांधीजी बहुत प्रसन्न हुए और गाँधी जी ने सुंदरलाल शर्मा को अपना गुरु मान लिया।

रायपुर जिले में गांधीजी के प्रवास के दौरान पडित रामदयाल तिवारी उनसे प्रभावित हुआ और गाँधी मीमांस नमक ग्रन्थ लिखना प्रारम्भ कर दिया। रामदयाल तिवारी छत्तीसगढ़ के विद्यासागर कहे जाते है।

छत्तीसगढ़ में प्रथम निर्वाचन 

1937 को यंहा पहली बार चुनाव हुआ। उस समय छत्तीसगढ़ मध्य प्रान्त और बरार का हिस्सा था। रायपुर से पंडित रविशंकर शुक्ल ,बिलासपुर से ई. राघवेंद्र राव दुर्ग से घनश्याम सिंह गुप्त निर्वाचित हुए।

4 जुलाई 1937 को मध्य प्रान्त के मुख्यमंत्री बी.जी.खरे बने और शिक्षा मंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल बने। कुछ कारनवश बी.जी.खरे ने त्यागपत्र दिया और 29 जुलाई 1937 को पंडित रविशंकर शुक्ल यंहा के मुख्यमंत्री बने।

छत्तीसगढ़ में क्रांतिकारी आंदोलन

छुई खदान जंगल सत्याग्रह –

1938 में छुई खदान जंगल सत्याग्रह हुआ जिसके नेता थे समारू बरई। उस समय छुई खदान रियासत में कांग्रेस की स्थापना हुई थी। जिसका उद्देश्य जनता को सरकारी शोषण से बचाना था। जनता ने मिल कर वंहा जंगल सत्याग्रह आरम्भ किया था।

बदराटोला जंगल सत्याग्रह –

21 जनवरी 1939 को बदराटोला नमक गांव से जंगल सत्याग्रह की शुरवात हुई। जिसके नेता रामधीन गोंड थे। इस आंदोलन में करीब 300 – 400 लोग शामिल हुए थे। इस सत्याग्रह को रोकने के लिए सरकार ने कई हथकंडे अपनाये। लोगो को गिरफ्तार किया गया।

अहिंसावादी आंदोलन पर अंग्रेजो ने लाठिया बरसाई। कई लोग घायल हुए पर लोगो ने सत्याग्रह करना जारी रखा। जब अंग्रेज नाकाम हो रहे थे तो उन्होंने निहत्थे जनता पर गोलिया चलाई जिसके चलते इस आंदोलन के नेता रामधीन गोंड की मृत्यु हो गयी और कई लोग घायल हुए।

रायपुर षड़यंत्र केस-

1942 में परसराम सोनी ने अंग्रेजो के खिलाफ एक बड़ी घटना को अंजाम देने की यजना बनाई थी।परन्तु शिवनंदन ने अंग्रजो को यह बात बता दी और अंग्रजो ने परसराम सोनी को गिरफ्तार कर लिया। 7 साल की सजा हुई।

26 जून 1946 को मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल की कोशिस के बाद उन्हें छुड़वाया गया।

रायपुर डायनामाइट कांड –

बिखल नारायण अग्रवाल ने कैदियों को रिहा करवाने के लिए रायपुर जेल की दिवार को डायनमाइट से उड़ाने की योजना बनाई थी। परन्तु योजना के चलते जेल के दिवार टूटी जरूर लेकिन कैदियों को रिहा नहीं करा पाए।

आधुनिक काल Part 2 पढ़ने के लिए यंहा क्लिक करे – PART-2

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