जनजातीय विद्रोह 

October 17, 2018

सोनाखान विद्रोह

सोनाखान का विद्रोह 1856 में हुआ था। यह विद्रोह सोनाखान के जमींदार वीरनारायण सिंह ने अंग्रेजो के विरुद्ध किया था। उस समय सोनाखान रायपुर जिले के बलौदाबाजार तहसील में आता था। सन 1856 में सोनाखान तहसील में अकाल पड़ा। यह अकाल इतनी भयंकर थी की वंहा के स्थानीय निवासी भूख के कारण मरने लगे थे। वीरनारायण को जब यह बात पता चली तो उसने कसडोल नामक स्थान में उपस्थित एक व्यापारी की गोदाम की अनाज अपनी भूखी जनता में बाँट दी। वीरनारायण सिंह ने इसकी जानकारी तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर को उसी समय बता दी थी । परन्तु शासकीय बयान में डिप्टी कमिशनर ने अपना बयान तोड़ मडोकर पेश किया। इस वजह से वीरनारायण सिंह को जेल भेज दिया गया। पैदल सेना की मदद से वीरनारायण सिंह जेल से भागने में कामयाब हुए। पर कुछ समय बाद ही लेफ्टिनेंट स्मिथ ने जमीदारो के मदद से वीरनारायण सिंह को पुनः पकड़ लिया। तत्कालीन डिप्टी कमिशनर इलियट ने वीरनारायण सिंह पर राजद्रोह का आरोप लगाकर फांसी की सजा सुना दी। 10 दिसम्बर 1857 को रायपुर के जयस्तम्भ चौक पर वीरनारायण सिंह को फांसी पर चढ़ा दिया गया। वीरनारायण सिंह छत्तीसगढ़ स्वतंत्रता आंदोलन के प्रथम शहीद के नाम से जाने जाते है। वर्तमान समय में इनके नाम पर इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम नया रायपुर में स्थित है।

हल्बा विद्रोह

हल्बा विद्रोह अजमेर सिंह के द्वारा सन 1774 से 1779 के बिच में हुआ था। यह विद्रोह उत्तराधिकारी के लिए हुआ था। अजमेर सिंह का विपक्षी दरियाव देव था। सन 1777 में अजमेर सिंह के मृत्यु के बाद विद्रोह समाप्त होने लगा। इसमें भारी संख्या में हल्बा सेनाओं की हत्या की गयी।

परलकोट विद्रोह

परलकोट विद्रोह 1825 में हुआ था। उस समय यंहा के शासक महिपाल देव था। परलकोट के जमींदार गेंदसिंह के नेतृत्व में यह जनजातीय विद्रोह हुआ था। अंग्रेजो और मराठो के प्रति असंतोष ही इस विद्रोह का कारण बना था। प्रतिक चिन्ह के रूप में धारवाड़ वृक्ष के टहनियों का प्रयोग करते थे।

मेरिया विद्रोह

मेरिया विद्रोह 1842 से 1863 के बिच हुआ। उस समय यंहा के शासक भूपाल देव था। इस विद्रोह का नेतृत्व हिड़मा मांझी ने की थी। इस विद्रोह का प्रमुख कारण था अंग्रेजो के द्वारा दंतेश्वरी मंदिर में नरबलि प्रथा को समाप्त करना। उस समय मेरिया लोगो का कहना था की अंग्रेज हमारी संस्कृति में हस्तक्षेप न करे।

तारापुर विद्रोह

यह विद्रोह 1842 से 1854 के बिच में हुआ था। उस समय यंहा के शासक भूपाल देव था। तारापुर विद्रोह का नेतृत्व दलगंजन सिंह ने किया था। उस समय अंग्रेजो द्वारा तारापुर में कर बढ़ने की वजह से यह विद्रोह हुआ था। परिणाम दलगंजन सिंह के पक्ष में गया और अंग्रेजो ने कर नहीं बढ़ाया।

लिंगागिरी विद्रोह

यह विद्रोह 1856 से 1857 के बिच में हुआ था। उस समय यंहा के शासक भैरम देव था। लिंगागिरी विद्रोह का नेतृत्व धुर्वाराव मदिया ने की थी। उस समय अंग्रेज लिंगागिरी क्षेत्र में अपना अधिकार जमाना चाहते थे। इसी विरुद्ध में लिंगागिरी विद्रोह हुआ था। परिणाम स्वरूप धुर्वाराव को फांसी दे दी गयी।

कोई विद्रोह

यह विद्रोह 1859 में हुआ था। भैरम देव यंहा के शासक थे। इस विद्रोह के नेता नांगुल दोर्ला था। इस विद्रोह का प्रमुख कारण उस क्षेत्र में हो रहे साल वृक्षों की कटाई पर रोक लगाना था। यह पहला विद्रोह था जो सफल रहा और अंग्रेजो की हार हुई।

मुरिया विद्रोह

यह विद्रोह 1876 में हुआ था। इस विद्रोह को बस्तर का स्वाधीनता संग्राम कहते है। उस समय के शासक भैरम देव था। इस विद्रोह का नेतृत्व झाड़ा सिरहा जो कि एक मुरिया आदिवासी थे, ने किया था। आम वृक्ष टहनियों को इन्होने अपना प्रतिक चिन्ह बनाया था। अंग्रेजो द्वारा की गयी असहनीय नीतियों के विरुद्ध यह विद्रोह हुआ था।

भूमकाल विद्रोह

यह विद्रोह 1910 में हुआ था। उस समय के शासक रुद्रप्रताप देव थे। गुण्डाधुर इनके प्रमुख नेता थे। अंग्रेजो के द्वारा बस्तर क्षेत्र हुकूमत के विरुद्ध यह विद्रोह हुआ था। लालमिर्च और आम कि टहनिया इस विद्रोह का प्रतिक चिन्ह था। सोनू मांझी ने गुण्डाधुर से धोखेबाजी कि जिसके फलस्वरूप गुण्डाधुर पकड़ा गया। बाद में गुण्डाधुर अंग्रजो के चंगुल से भागने में सफल हुआ।

हनुमान सिंह का विद्रोह

हनुमान सिंह बैसवारा के राजपूत थे और रायपुर बटालियन में मैगनीज लश्कर के पद थे। इसे छत्तीसगढ़ का मंगल पांडेय कहा जाता है। यह अंग्रेजो के दमनकारी नीतियों से परेशान थे। इन्होने अपने 17 साथियो के साथ मिलकर मेजर सिडवेयर की हत्या कर दी। 18 जनवरी 1858 को हनुमान सिंह और उसके सभी साथी गिरफ्तार कर लिए गए। पर हनुमान सिंह वंहा से भागने में कामयाब हो गए। हनुमान सिंह के साथियो को 22 जनवरी 1858 को फांसी दे दी गयी।

सुरेंद्रसाय का विद्रोह

सुरेंद्र साय सम्बलपुर के जमींदार थे। इन्हे छत्तीसगढ़ स्वतंत्रता आंदोलन के अंतिम शहीद कहते है। इन्होने वीरनारायण सिंह के पुत्र के साथ मिलकर उत्तराधिकारी युद्ध किया था। यह अंग्रजो को  सही नहीं लगा और हजरीबाग जेल में बंद कर दिया। 31 अक्टूबर 1857 को जेल से फरार हो गए। इनकी मृत्यु 1884 में हुआ।

 

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