छत्तीसगढ़ का मध्यकालीन इतिहास

October 16, 2018

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मध्यकालीन इतिहास

आईये इस आर्टिकल के माध्यम से हम छत्तीसगढ़ के मध्यकालीन इतिहास के बारे में जानने की कोशिश करेंगे। छत्तीसगढ़ के मध्यकालीन इतिहास में  कुल 5 वंशो ने राज किये।

1.कल्चुरी वंश ( रतनपुर और रायपुर )

2.फणिनाग वंश ( कवर्धा )

3.सोम वंश ( कांकेर )

4.छिन्दक नागवंश ( बस्तर )

5.काकतीय वंश ( बस्तर )

कल्चुरी वंश (1000 -1740 )-

कल्चुरी वंश के संस्थापक कलिंग राज को माना जाता है। कल्चुरी वंश ने पुरे भारत में 550 से 1741 तक किसी न किसी जगह राज किये थे। चंदनबरदायी के ‘पृथ्वीराज रासो’ में इनका वर्णन मिलता है।

पुरे भारत में किसी एक वंश द्वारा, यह सबसे लम्बी शासन करने वाला वंश है। छत्तीसगढ़ में इनकी शुरुवात त्रिपुरी (जबलपुर) के कलचुरियो के वंश के द्वारा हुआ था। उस समय त्रिपुरी के कल्चुरी वंश के संस्थापक वामनराज देव था, तथा स्थायी रूप से शासन चलाने के श्रेय कोकल्ल देव को जाता है।

प्रमुख शासक

कलिंगराज (1000-1020 ईस्वी )

कलिंग राज लक्ष्मणराज के पुत्र थे। लक्ष्मणराज उस समय के त्रिपुरी के शासक थे।

कलिंग ने तुम्माण को अपनी राजधानी बनायीं। जो की आज के समय में कोरबा शहर के नाम से जाना जाता है।

चैतुरगढ़ के महामाया मदिर का निर्माण कलिंग राज ने ही करवाया था।

कमल राज ( 1020 – 1045 )

कमल राज के बारे में इतिहास  से ज्यादा कुछ प्रभावित करने वाली बाते प्राप्त नहीं हुई है परन्तु इसने उत्त्कल से वापस आते हुए साहिल नाम का एक व्यक्ति अपने साथ लाया था जिन्होंने इसके राज्य के विस्तार में इनकी बहुत मदद की।

राजा रत्नदेव ( 1045 – 1065 )

आज के रतनपुर को बसाने का श्रेय रत्नदेव को जाता है। 1050 में इन्होने रतनपुर को बसाया था और अपनी  राजधानी भी घोषित किया था। इन्होने कोमोमंडल के प्रमुख वजू वर्मा की पुत्री नोनल्ला से विवाह किया था।

रतनपुर में माँ महामाया मंदिर की स्थापना राजा रत्नदेव ने ही की थी। उस समय रतनपुर की वैभव को देखकर सब रतनपुर को कुबेरपुर भी कहा करते थे।

पृथ्वीदेव प्रथम ( 1065 – 1095 )

उपाधि- “सकल कोसलाधिपति

इन्होने अपने शासन काल के दौरान अनेक मंदिरो और तालाबों का निर्माण कराया था। तुम्माण के बांकेश्वर मंदिर में चतुंषिक्का (चार खम्भों वाला मंडप ) का निर्माण, पृथ्वीदेवेश्वर सिंह मंदिर,रतनपुर का विशाल तालाब का निर्माण इनके प्रमुख निर्माणों में से एक है।

अमोदा ताम्रपत्र में मिली जानकारी के अनुसार पृथ्वीदेव प्रथम 21 हजार गावो का स्वामी था।

जाजल्लदेव प्रथम( 1095 -1120 )

उपाधि – गजशार्दूल

जाजल्लदेव प्रथम ने उड़ीसा के शासक भुजबल और छिन्दकनाग वंश के शासक सोमेश्वर को हराया था। इन्होने अपने नाम के स्वर्ण एवं ताम्बे के सिक्के चलवाये थे।

इन्होने गजशार्दूल की उपाधि धारण किया था। गजशार्दूल का अभिप्राय है -हाथियों का शिकारी। नया शहर बसाया जाजल्लपुर, जिसे हम अभी जाजंगीर शहर के नाम से जानते है।

पाली के शिव मंदिर का जीर्णोद्धार का श्रेय इन्ही को जाता है।

रत्नदेव द्वितीय (1120 -1135 )

उपाधित्रिलिंगाधिपति

अपनी शासनकाल में सोने और चांदीके सिक्के चलवाये। गैंग वंशीय शासक अनंतवर्मन को इन्होने पराजित किया था।

पृथ्वीदेव द्वितीय (1135 -1165 )

चाँदी के सबसे छोटे सिक्के चलवाने का श्रेय इन्ही को जाता है। इनके शासन काल में जगतपाल द्वारा राजीवलोचन मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया था।

जाजल्लदेव द्वितीय ( 1165 – 1168  )

इसके बारे में कुछ खास इतिहास से प्राप्त नहीं हुए है।

जगददेव ( 1168 -1178 )

ये जाजल्लदेव का भाई था। जो गैंग राजाओ के दमन के लिए निकला था।

रत्नदेव तृतीय ( 1178 – 1198 )

यह जगददेव का बेटा था। इसके मंत्री गंगाधर राव ने खरौद के लखनेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था और रतनपुर में एकवीरा देवी का मंदिर का निर्माण करवाया था।

प्रतापमल्ल ( 1198 – 1222 )

सिंह और कटार की आकृति चिन्ह अंकित वाले ताम्बे के सिक्के चलाये। इसके दो सामंत थे पहला जसराज और दूसरा यशोराज।

“1122 के बाद लगभग 250 सालो का इतिहास, इतिहासकारो के द्वारा कलचुरी शासको का कोई वर्णन नहीं मिला है इसलिए इस समय को अंधकार युग कहा गया है।

इसके बाद के शासक

बहरेन्द्र साय ( 1480 – 1525 )

कल्याण साय ( 1544  – 1581)-

कल्याण साय मुग़ल के सम्राट अकबर के समकालीन था। कल्याण से के राजस्व की जमाबंदी प्रणाली शुरू की थी। इसी जमाबंदी प्रणाली के अनुसार ही ब्रिटिश अधिकारी चिस्म ने बाद में छत्तीसगढ़ को 36 गढ़ोमें बांटा था।

लक्ष्मण साय ( 1581-1600 )

इन्होने देशबही बनवाया था जिसके जरिये राज्य में लगने वाला करो का लेखा जोखा होता था।

तखत सिंह (17वी शताब्दी )

औरंगजेब का समकालीन था। तखतपुर शहर बसाया था।

राज सिंह

प्रसिद्ध कवि गोपाल मिश्र ने खूब तमाशा की रचना इसी के शासन काल में किया था।

सरदार सिंह

रघुनाथ सिंह  अंतिम कलचुरी शासक
मोहन सिंह– मराठो के अधीन अंतिम कलचुरी शासक।

 

कलचुरियो की रायपुर या लहुरी शाखा

कलचुरियो के रायपुर  शाखा  के संस्थापक केशव देव थे। रामचंद्र देव् ने रायपुर शहर को बसाया था। ब्रह्मदेव ने 1409 में रायपुर को अपनी राजधानी बनाई थी,और रायपुर के दूधाधारी मठ का निर्माण कराया था। ब्रह्मदेव के समय 1415 में देवपाल जो की पेशे से मोची थे। उन्होंने खल्लारी में खल्लारी देवी माँ का मंदिर बनवाया था।

अंतिम शासकअमरसिंह

उस समय प्रशासनिक सुविधा के लिए राज्य 36 गढ़ो में बांटा गया था। जिसका प्रमुख दिवान हुआ करता था। 1 गढ़ बारहो में विभाजित था जिसका प्रमुख दाऊ होता था। बारहो गावो में विभाजित था जिसका प्रमुख गौटिया होता था। गांव शासन करने की सबसे छोटी इकाई थी।

1 गढ़ =7 बारहो =84 गांव

कवर्धा के फनी नागवंश

कवर्धा के फणिनागवंश के संस्थापक अहिराज थे। 1089 (11वी सदी ) में गोपाल देव ने भोरमदेव मंदिर का निर्माण कराया था। भोरमदेव का मंदिर नागर शैली में निर्मित है। भोरमदेव एक आदिवासी देवता है। भोरमदेव के मंदिर को छत्तीसगढ़ का खजुराहो कहते है।

रामचंद्र देव ने 1349 (14वी सदी ) में मड़वा महल का निर्माण करवाया था। मड़वा महल  को दूल्हादेव भी कहते है।मड़वा महल एक शिव मंदिर है, जो विवाह का प्रतिक है। इसी मड़वा महल में रामचंद्र जी ने कलचुरी की राजकुमारी ‘अम्बिका देवी ‘ से विवाह किया था।

कांकेर के सोम वंश

कांकेर के संस्थापक सिंहराज थे। इसके बाद व्याघराज  ने शासन किया। इसके बाद वोपदेव ने शासन किया। वोपदेव के के बाद कर्णराज, सोमराज,कृष्णराज ने शासन किया। सिहावा ताम्रपत्र , तहनाकपारा तामपत्र और कांकेर शिलालेख से   कांकेर के सोमवंश का वर्णन मिलता है।

बस्तर के छिन्दक नागवंश

बस्तर में छिन्दक नागवंश की स्थापना नृपतिभूषण ने की थी। इसकी राजधानी चक्रकोट था। जिसे आज के समय चित्रकोट के नाम से जानते है। छिन्दक नागवंशी राजा लोग भोगवतीपुरेश्वर की उपाधि धारण करते थे।

प्रमुख शासक

1.नृपतिभूषण  2.धारावर्ष   3.मधुरतंक  4.सोमेश्वर देव   5.सोमेश्वर द्वितीय   6.जगदेव भूषण   7.हरिश्चंद्र देव ( अंतिम शासक )

बस्तर के नागवंशी शासको की 2 शाखाये थे। शावक संयुक्त व्याघ्र और कमल कदली। शावक व्याघ्र के शासक शैव धर्म के अनुयायी थे और कमल कदली वैष्णव धर्म के अनुयायी थे।

बारसूर के मामाभांजा मदिर का निर्माण छिन्दकवंशियो के राजाओं ने कराया था।

काकतीय वंश (1324 – 1961 )

इस वंश के संस्थापक अन्नमदेव थे। इनकी राजधानी मान्घ्यता हुआ करता था। अन्नमदेव ने दंतेवाड़ा की दंतेश्वरी देवी मंदिर का निर्माण कराया था। लोक गीतों में अन्नमदेव को छलकी बंश राजा कहा गया है।

प्रमुख शासक 

अजमेर सिंह

इसे क्रांति का मसीहा कहा जाता है। भोसले के अधीन नागपुर की सेना ने अजमेर सिंह पर आक्रमण कर दिया और अजमेर सिंह की हार हुई।

दरियादेव

अजमेर सिंह के खिलाफ मराठो की सेना को दरियादेव ने ही लाया था। दरियादेव ने कोटपाड़ कि संधि की और बस्तर नागपुर रियासत के अंतर्गत रतनपुर के अधीन आ गया। इसी समय बस्तर छत्तीसगढ़ का भाग बना। कप्तान ब्लंट पहले अंग्रेज थे यात्री थे जो बास्टर के समीप आये थे, किन्तु बस्तर में प्रवेश नहीं कर पाए थे।

महिपाल देव

इसके शासन काल में ही परलकोट का विद्रोह हुआ था। इन्होने  बोसलो को टकोली देना बंद कर दिया था। जिसके कारण ब्योंकोजी भोसले के सेनापति रामचंद्र बाघ के नेतृत्व में बस्तर में आक्रमण किया। इसमें महिपाल की हार हुई थी।

भूपाल देव

इसके शासनकाल में मेरिया विद्रोह और तारापुर विद्रोह हुआ था

भैरव देव

भैरव देव अंग्रेजो के अधीन प्रथम शासक। भैरव देव के शासन काल के समय सन 1856  में छत्तीसगढ़ के पहले डिप्टी कमिश्नर चार्ल्स इलियट पहली बार बस्तर आया था।

रानी चोरिस

छत्तीसगढ़ की प्रथम विद्रोहणी रानी चोरिस को कहते है।

रूद्रप्रताप देव

रुद्रप्रताप देव ने राजकुमार कालेज रायपुर से पढाई की और 1908 में इसका राज्य अभिषेक हुआ था। इन्होने ही जगदलपुर शहर बसाया था। 1910 में इन्ही के शासनकाल के समय में भूमकाल विद्रोह हुआ था। एवं घैटीपोनि प्रथा प्रचिलत हुई थी।

प्रफुल्ल कुमारी देवी

छत्तीसगढ़ की पहली और एक मात्र महिला शासिका प्रफुल्ल देवी थी। जिनकी राज्य अभिषेक 12 साल की उम्र में ही हो गया था।

प्रवीरचंद भंजदेव

आखरी काकतीय शासक यही थे। 1948 में बस्तर रियासत का भारत संघ में विलय हो गया।

!!पढ़ने के लिए धन्यवाद!!अगले आर्टिकल में हम छत्तीसगढ़ के आधुनिक काल के बारे में पढ़ेंगे !! 

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