छत्तीसगढ़ का प्राचीन काल 

October 16, 2018

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प्राचीन काल 

इस आर्टिकल के माध्यम से आज हम छत्तीसगढ़ के प्राचीन काल के बारे में पढ़ेंगे जिसमे प्रागैतिहास काल, पाषाण काल, सिंधु घाटी सभ्यता, वैदिक काल, रामायण काल, महाभारत काल आदि के बारे में जानेंगे।

प्रागैतिहासिक काल

प्रागैतिहास काल उस समय को कहा जाता है जंहा की इतिहास जानने के लिए सिर्फ पुरातात्विक सामग्री ही उपलब्ध है। उस समय मनुष्य और पशु में कोई जयदा अन्तर नहीं था। समय बदलते गया और मनुष्य मैदानी इलाकों में रहने लगे। इसी समय मुनष्य पत्थरो के बने औजारों का उपयोग शिकार करने के लिए करते थे। इस काल के बहुत सारे श्रोत छत्तीसगढ़ से मिलते है।

पूर्व पाषाण युगीन अवशेष महानदी घाटी और रायगढ़ के सिंघनपुर से प्राप्त हुए है। मध्ययुगीन अवशेष रायगढ़ के कबरा पहाड़ में बने चित्रों से मिलता है। कबरा पहाड़ में आदिमानव के कुछ उपकरण, अस्थि पत्र और अवजार मिले है।

पूर्व पाषाण काल के बाद नवपाषाण काल आता है, इस काल में मनुष्य अस्थायी कृषि, पशुपालन स्थायी वास आदि प्रारम्भ कर दिया था। जिसके प्रमाण टेमर (रायगढ़), अर्जुनी (दुर्ग), चितवाडोंगरी( राजनांदगांव) से मिलता है।

नवपाषाण काल के बाद ताम्र और लौह युग की शुरुआत हुई, इसके ज्यादा कुछ प्रमाण छत्तीसगढ़ से नही मिले है।

सिंधु घाटी की सभ्यता

हमारे छत्तीसगढ़ में न कोई साक्ष्य सिंधु घाटी की सभ्यता के बारे में प्राप्त होते और न ही हड़प्पा सभ्यता के बारे में ।

वैदिक काल

वैदिक काल भारतीय इतिहास में 1500 ई.पू से 6वी शताब्दी तक था इस काल का श्रोत वेद और अन्य वैदिक ग्रन्थ है। वैदिक ग्रंथो में छ.ग से संबधित किसी भी प्रकार की कोई प्रामाणिक साक्ष्य प्राप्त नहीं होता। हालांकि उत्तर वैदिक काल में आर्यो का आगमन छ.ग में हुआ था।

रामायण काल

रामायण महाकाव्य के अनुसार अभी का जो छ.ग है, वह उस समय दक्षिण कोसल का भाग था। इसकी राजधानी कुस्थली हुआ करती थी। उस समय के जो राजा यंहा राज करते थे उसका नाम भानुमंत था। राजा भानुमंत के पिता का नाम महाकोशल था। इसी वजह से इस क्षेत्र का नाम “कोसल” प्रदेश पड़ा। इतिहास के अनुसार राजा भानुमंत की पुत्री कौशल्या का विवाह राजा दशरथ से हुआ था। छत्तीसगढ़ श्री राम जी का ननिहाल था।

श्री राम की वनवास का अधिकांश समय छ.ग में ही गुजरा था। सरजुगा जिले में रामगढ की पहाड़ी, सीताबेंगरा की गुफा में काफी समय व्यतीत किये। यही पर बाली वध और किष्किंधा पर्वत का प्रमाण मिलता है।

बारनवापारा अभ्यारण्य के समीप “तुरतुरिया” नमक जगह है जंहा वाल्मीकि ऋषि का आश्रम हुआ करता था। यही पर लव- कुश का जन्म हुआ।

शिवरीनारायण को सबरी आश्रम के रूप में जाना जाता है। कहा जाता है की यंही श्री राम ने शबरी के झूठे बेर खाये थे। जजंगीर-चापा में भगवान् श्री राम के छोटे भाई लक्ष्मण द्वारा स्थापित लखेश्वर महादेव मंदिर है जिसे अब लाख चाउर मंदिर के नाम से जाना जाता है। यंही के खरौद में खरदूषण का राज्य भी था।

महाकाव्य के अनुसार जिस जगह पर सीता जी का हरण हुआ था वो स्थान कांकेर जिला में है। जिसे पंचवटी के नाम से हम सब जानते है।

महाभारत काल

महाभारत महाकाव्य के अनुसार छत्तीसगढ़ कोसल का भाग था। यंहा आज के रतनपुर पहले मणिपुर हुआ करता था, खल्लारी खलवाटिका और सिरपुर चित्रांगदपुर हुआ करता था। खल्लारी में भीम के पाँव के निशान आज भी मौजूद है। अर्जुन की पत्नी चित्रांगदा सिरपुर की राजकुमारी थी। गुंजी नमक स्थान जो की जांजगीर-चापा में है उसे ऋषभ-तीर्थ माना जाता है।

महाजनपद काल

कोसल एक महाजनपद था, जिसके दो भाग थे
1. उत्तर कोसल
2. दक्षिण कोसल

दक्षिण कोसल अभी का छ.ग था और यह चेदि महाजनपद के अंतर्गत आता था। इसी कारण इसे चेदिसगढ़ भी कहा जाता था।

डॉ हीरालाल के अनुसार भी छ.ग चेदि महाजनपद का भाग था। इनके अनुसार छत्तीसगढ़ शब्द चेदिसगढ़ का अपभ्रंश है।

जी.वी. पेलगर के अनुसार “मगध” महाजनपद के राजा जरासंघ के अत्याचार से दुखी होकर छत्तीस घर इस प्रदेश में आकर रहने लगे। फिर वक्त के साथ यही छत्त्तीस घर “छत्तीसगढ़” रूपांतरित हुआ।

ह्वेनसांग की सी-यू-की तथा बौध्द ग्रन्थ ‘अवदानशतक’ के अनुसार महात्मा बुध्द दक्षिण कोसल आये थे तथा 3 महीने दक्षिण कोसल की राजधानी “श्रावस्ती” में रहे थे।

मौर्य काल (332 .पू.) –

छत्तीसगढ़ इससे पहले कलिंग देश का भाग था। सम्राट अशोक के कलिंग विजय के बाद छत्तीसगढ़ मौर्य साम्राज्य का भाग बना। मौर्य काल में बनी जोगीमारा की गुफा आज भी छत्तीसगढ़ में मौजूद है।

गुफा में बनी चित्रों में पाली भाषा और ब्राम्ही लिपि में “सुतनुका ” और “देवदत्त” की प्रेमगाथा लिखी हुई है। जांजगीर-चापा और रायगढ़ में मौर्य कालीन सिक्के प्राप्त हुआ है। ‘कपटपुरम’ सरजुगा में अशोक के लाठ प्राप्त हुआ है।

व्हेनसांग की यात्रा के अनुसार अशोक ने सिरपुर में बौद्ध स्तूप का निर्माण कराया था।

माना जाता है की भरत मुनि ने अपनी नाट्यशाला की रचना 200 ई.पू. में रामगढ की पहाड़ी में किया था।

सातवाहन काल (200 .पू. से 60 .पू. तक )

घासीदास संग्रहालय में रखा हुआ ‘काष्ठ स्तम्भ’ सातवाहन काल से प्राप्त हुआ है। यह काष्ठ स्तम्भ जांजगीर-चापा जिला के ‘किरारी’ नामक गांव के तालाब में मिले है। सातवाहन काल के शासक अपीलक का सिक्का चंद्रपुर के पास के गांव “बार” में मिले है।

सातवाहन शासक अपने आप को दक्षिणपथ का स्वामी कहते थे। मल्हार में मिटटी की मुहर प्राप्त हुई है, जिसमे वेदश्री का वर्णन है। इतिहासकारो का मानना है की यह सातवाहन शासक का है।

वाकाटक वंश ( 3री से 4थी तक) –

दुर्ग जिला के मोहल्ला नाकाम जगह से वाकाटक कालीन सिक्के मिले है।
वाकाटक वंश के शासक-
-महेंद्र सेन
-रुद्रसेन
-प्रवरसेन
-नरेंद्र सेन
-पृथ्वी सेन द्वितीय
-हरिसेन
वाकाटकों की सोने की सिक्के बानबरद गांव से प्राप्त हुआ है।
प्रवरसेन के दरबार में चन्द्रगुप्त द्वितीय का भाट कवी ‘कालिदास’ था।

गुप्त काल (चौथी से छटवी A D ) –

इस काल में बस्तर को महाकांतार कहा जाता था और छत्तीसगढ़ को दक्षिणापथ कहा जाता था। प्रयाग प्रशस्ति अभिलेख के अनुसार समुद्रगुप्त ने महाकांतार के शासक व्याघ्रराज को हराया था। अभी के महासमुंद के पास बहुत समय तक समुद्र गुप्त की सेना ठहरी हुई थी, जिसके आधार पर महासमुंद जिला का नामकरण माना जाता है।

पास में ही कोपरा नामक जगह है जहा से समुद्रगुप्त की पत्नी रूपादेवी से सम्बंधित कई साक्ष्य प्राप्त हुए है। दुर्ग के पास बानाबरद में 20 गुप्तकालीन सिक्के मिले है जिनमे रामगुप्त,चन्द्रगुप्त द्वितीय,कुमारगुप्त का उल्लेख मिलता है।

आरंग से कुमारगुप्त का मयूर का सिक्का प्राप्त हुआ है। खरसिया के नजदीक विक्रमादित्य का धनुर्धारी सिक्का मिला है।

इसी काल में कालिदास जी ने मेघदूतम की रचना रायगढ़ के पहाड़ियों में की थी। स्पष्ट रूप से साक्ष्य नहीं मिले है पर ऐसा कहा जाता है।

राजष्रितुल्य वंश

इनका काल 5वी से 6वी शताब्दी तक रहा है। इनकी राजधानी आरंग हुआ करती थी। इस वंश के संथापक शूरा थे। इस वंश को शूरा राजवंश भी कहा जाता है।
इसके बाद और भी राजा हुए जो की यह है –
भीमसेन
दयित
दयित द्वितीय
विभीषण
भीमसेन द्वितीय
इन सभी का उल्लेख भीमसेन द्वितीय के आरंग ताम्रपत्र से मिलता है।

नलनाग वंश ( 5वी से 7वी ) –

नल नाग वंश की राजधानी कोरापुट था। इस वंश का संस्थापक शिशुक था किन्तु इसके वास्तविक संस्थापक वराहराज को माना जाता है। वराहराज की 29 सोने की सिक्के कोंडागांव के एडेंगा नमक स्थान से प्राप्त हुई है।

इस वंश के प्रसिद्ध राजा बिलासतुंग थे। यह भगवान् विष्णु के भक्त थे। इसी कारण बिलासतुंग ने राजिम में राजीव लोचन मंदिर बनवाया था।
इस काल में बहुत सारे राजाओं ने राज किये जिसमे से एक राजा अर्थपति ने सोने के सिक्के अपने राज में चलवाये थे।

अर्थपति की राजधानी पुष्करी हुआ करती थी जिसे वाकाटक के नरेश पृथ्वीसेन ने राजा अर्थ पति को हराकर तहस-नहस कर दिया था।

शरभपुरी वंश

इस वंश के संस्थापक शरभराज है। इनकी राजधानी शरभपुर हुआ करती थी। जो आज के समय में सारंगढ़ या संबलपुर है। इस वंश का लेख सम्बलपुर से प्राप्त हुए है। श्रीपुर इनकी उपराजधानी हुआ करती थी।

शरभपुरिया के ताम्रपत्रों और सिक्को में गजलक्ष्मी थी। जो यह साबित करता है की गजलक्ष्मी इनकी राजमुद्रा थी। शरभपुरीय अपने आप को परमभागवत कहते थे। इस वंश में भी बहुत सारे शासक हुए जिसमे से प्रसन्नमात्र और प्रवराज मुख्य थे।

प्रसन्नमात्र ने गरुड़,शंख ,चक्रयुक्त सोने की सिक्के चलवाये। प्रवराज ने सिरपुर को अपनी राजधानी बनाई।

सिरपुर के पाण्डु वंश / सोमवंश – 

इनकी राजधानी श्रीपुर हुआ करती थी। इनकी दो शाखाये थी, मैकल श्रेणी और दक्षिण कोसल।

मैकल श्रेणी में इनको पाण्डु वंश कहा जाता था और दक्षिण कोसल में इनको सोम वंश कहा जाता था। इस समय छत्तीसगढ़ का नाम प्राक कोसल था जिसमे दक्षिण कोसल,पूर्व कोसल, तोसल उट्टकल शामिल थे।

प्रसिद्ध शासक

महाशिव तीवरदेव

इस काल को पाण्डु वंश का स्वर्ण काल कहते है। महाशिव को सकल कोशलाधिपति की उपाधि मिली थी। इसके तीन ताम्रपत्र प्राप्त हुए है ,जिसमे राजिम और बालोद के प्रमुख है।

नंनदेव द्वितीय

नंनदेव द्वितीय को कोसलामंडलाधिपति की उपाधि मिली थी । इसकी कोई संतान नहीं था इसलिए तीवरदेव का भाई चन्द्रगुप्त शासक बना।

चन्द्रगुप्त

यह ननदेव का चाचा और तीवरदेव का भाई था। चन्द्रगुप्त उतने प्रसिद्ध नहीं हुए।

हर्षगुप्त

यह चन्द्रगुप्त का पुत्र था। इनका विवाह वासटादेवी से हुआ था। हर्षगुप्त की स्मृति में ही उसकी पत्नी वासटादेवी ने सिरपुर के लक्ष्मण मंदिर का निर्माण कार्य शुरू करवाया था।

महाशिव गुप्त बालाअर्जुन

यह हर्षगुप्त और वासटादेवी का पुत्र था। लक्ष्मण मंदिर का बाकि बचे कार्य इसी ने पूरा करवाया था। इसी काल को छत्तीसगढ़ का स्वर्ण काल कहा जाता है।

639 में चीनी यात्री व्हेनसांग छत्तीसगढ़ की यात्रा में आये थे। अपनी रचना सीयुकी में इन्होने छत्तीसगढ़ को कियालो नाम से अंगित किया था। इन्होने बौद्धविहार स्पूत और बुद्ध के विशाल मूर्ति का भी उल्लेख किया। महाशिव गुप्त के 27 ताम्रपत्र सिरपुर से प्राप्त हुए है।

 

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